
का भइया! इहे हऽ होली?
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कीचड़ , कनई, गोबर ,गंदा,
रंग रसायन कऽ सब धंधा।
परब खुशी कऽ नासमझी में,
बनि जाला गर्दन कऽ फंदा।
गइल गुलाल अबीर रंगोली,
का भइया ! इहे हऽ होली ? (१)
दारू पी हुड़दंग मचावें,
बदला काढ़ें,वैर बढ़ावें।
ओरी,खोरी,डहरी,मोरी,
ढ़ऽहे, लऽड़े रार मचावें।
बोले फूहर गारी बोली,
का भइया ! इहे हऽ होली ? (२)
मरयादा कऽ मान न राखें,
सम्बन्धन कऽ ध्यान न राखें।
हद हो जाला अनाचार कऽ,
नीमन बाउर ग्यान न राखें।
ध्यान रहे बस गोरी चोली,
का भइया ! इहे हऽ होली ? (३)
दिन हउवे कटुता काटे कऽ,
‘छितराइल संग’ के साटे कऽ।
स्नेह,संस्कृति,सदाचार कऽ,
नाता कऽ खांई पाटे कऽ।
तिउहरवा संग करें ठिठोली,
का भइया ! इहे हऽ होली ?
“रेहियो”के लागेला गोली ।।
ना भइया ई ना हऽ होली।। (४)
