आज कऽ हाल
दुतल्ला तीनतल्ला बन, कई बिगहा में घर जाता
नया रंग में,नया ढंग में ,सभे सुविधा से भर जाता ।
बड़ा अभिमान होला देखि के आपन कमाई के
महल खड़हर भइल, ई देखि लोचन लोर भर जाता ।।
रहे रुनझुन ,खनक छनछन ,कहानी हो गइल बा अब
गली, आंगन, दुआरा, झाड़, झाला घूर बाटे सब ।
इहाँ आकाश छूये में ,सभे अझुरा गइल एतना
कि देवकुर सून ताकऽता खुली ताला इहाँ फिर कब ।।
टुकुर टूटल कुकुर के ,काग चिरई अब न आवत बा
भरोसा भीखमंगन के दुआरे ना बोलावत बा ।
भवद्दी,नेवता,नाता पुरनका छूट सब जाता
जहाँ जनमल, पलल, खेलल, बढ़ल, ओहके भुलावत बा ।।
गढ़ल रहे पहिलका लोगवा ,थोरही पढ़े पावे
बनावे बसे खातिर गाँव में,धन शहर से लावे ।
घेराइल बा अब एतना मोह-लालच में सभे मनई
उजरि के गाँव से,जाके शहर के बात बतियावे ।।
लड़िकवन के पढावे-बढ़ावे सब शहर भागत बा
ऊ! माई-बाप के केतना बुझी केहू न आंकत बा ।
शहर के बात बाउर बा, शहर के मन में माहुर बा
किकुर जाता उहाँ के हवा में परिवार लगत बा ।।
शहर में सउख बा खाली, खरच से कम कमाई बा
बची ना गांव तब, जीये बदे पइसा चबाई का?
न मन के मन भरे पावल,ए दुनिया में केहू अबले
जो चाहीं, संग सबका गांव में रहि धन उगाई बा।।
मकानन पर पता लीखल रही, तब लोग पहचानी
घरे-गांवे-जवारे लोग खलसा नाँव से जानी ।
परी आफत- विपत, तब बे बोलवले आन आवेला
मरम ई, गांव के गहिर, शहर के लोग ना मानी।।
शहर के संगमरमर से, निमनका ‘रेही‘ गांवे कऽ
लिफाफा लकलकाता लाल लउके लोग नावे कऽ।
शहर में जान बा, पहिचान, परिचय प्रीति पइसा से
न जानी शहर में केहू के केहू लोग ठाँवे कऽ।।
इहे हालत रही त, फिर न कवनो गांव बचि पाई
पुरनका रीति मिटि जाई, सभे संस्कृति दरच जाई।
बुढ़ापा में भइल दोंहपच बहुत लाचार कइ देला
छुछुंदर-साँप के गति जी रहल बा बाप आ माई।।
डॉ विवेकानंद तिवारी ~ ‘ रेहिʼ✍
जिला प्रभारी संगठन बलिया
भोजपुरी विकास संस्थान
